Sep 1, 2016 - Ankur Mishra, Politics    No Comments

अरविन्द केजरीवाल को एक खुला पत्र – ‘आशा को निराशा में मत बदलने दो साहब’

नमस्कार सर,

मैं अंकुर मिश्रा – एक आम आदमी !

आशा है आप कुशल होंगे ! वक्त आगे बढ़ रहा है सबको लग रहा है आप देश के लोकतंत्र और देश को आगे ले जाने का एकमात्र सहारा बचा है ! सभी राजनीतकि दलो को लोगो ने आजमा लिया है ! लोगो ने शराब से पैसे तक लेकर वोट डाले है और लोग अभी भी ऐसा कर रहे है राजनैतिक दल भी पूरे जोर शोर से पैसे लेकर विधायक और सांसद बनाने के लिए टिकट बेच रहे है ! कुछ राजनैतिक दल जाति-पाति का सहारा लेकर चुनाव लड़ रहे है तो कुछ मंदिर – मस्जिद के नाम पर चुनाव लड़ रहे है !हर राजनैतिक दाल के मुखिया से लेकर एक छोटे मंत्री तक की जिंदगी मस्ती में गुजर रही है ! जनता एक वोट बैंक है जिसे चुनाव आने पर कैश किया जाता है ! उसके बाद जनता को मिलता है –
बलात्कार, भ्रष्टाचार, महंगाई, टूटी सड़के, आत्महत्या करते किसान, भूख से मरता गरीब और पांच साल तक फिर से रोती जनता !
सर देश में नयी आशा आयी है, निराशा दूर भागी है! आन्ना आंदोलन के बाद बहुत लोगो की आँखे खुली है, देश को और लोगो को बदला जा सकता है, देश की राजनीती को बदला जा सकता है आशा की नयी किरण जगाई है उस आंदोलन ने ! इस किरण को ऐसे मत बुझने दीजिये ! जनता को पता है और जनता जानती है की आपने कोई कसर नहीं छोड़ी अच्छे लोगो को टिकट देने में मगर मुझे अब लगता है आपको एक बार मंथन की आवश्यकता है ! मैं आपकी बात से सहमत  हूँ, किसी के माथे पे नहीं लिखा होता वो व्यक्ति कैसा है और अगर समाज में उसने एक अच्छी छवि बना रखी होती है तो सभी लोग उसे अच्छा ही मानते है !
मगर हो सकता है कुछ लोगो की नियत राजनीती में आने बाद ख़राब हो गयी हो, हो सकता है कुछ लोगो को भ्रष्टाचार करने का मन करने लगा हो, और ये भी हो सकता है मंत्रियों, विधायको या फिर आप कार्यकर्ताओ में कुछ की मानसिकता परिवर्तित हो गयी हो ! मेरा सुझाव है एक बार मंथन करके जो कुछ कमियाँ पार्टी के अंदर उत्पन्न हुयी है उन्हें समाप्त करें !
प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव से भी एक बार बात करके उन्हें एक बार फिर से अच्छी राजनीती के लिए प्रेरित किया जा सकता है ! अगर आप सच में देश की दुर्दशा को बदलने निकले हो तो एट्टीट्यूड और ईगो को एक तरफ रखना होगा ! जो सही है और अच्छे है उन्हें हजार बार मनाना पड़े तो भी मनाना पड़ेगा ! वार्ना आप एक और राजनीती दल बनकर बिखर जाएगा और कुछ दिनों बाद अरविन्द केजरीवाल एक और नेता के रूप में पहचाने जाने लगेंगे !
देश की जनता ने एक नयी सुबह का सपना देखा है और दिखाया है अन्ना आंदोलन से निकले राजनैतिक दल ने ! जो सप्ता की लालची नहीं, जिसे राजनीति नहीं करनी विकास करना है देश के खोखलेपन को ख़त्म करना है, देश को सुरक्षित करना है – सप्ता के लालच में आयी किरण बेदी को जनता ने नहीं छोड़ा साहब ! तो थोड़ा जनता के साथ चलिए ! तोमर, खान और संदीप कुमार जैसे और लोग आपकी पार्टी में न हो एक बार मंथन करिये !
विश्वास मानिये अगर इस बार जनता का भरोशा टूटा तो जनता का घाव कोई नहीं भर पायेगा और जनता जिंदगी में किसी पर विश्वास तो नहीं ही करेगी !
एक आम आदमी
Aug 9, 2016 - Ankur Mishra, Politics    4 Comments

नजीब जंग को एक खुला पत्र – ‘जंग साहब – दुआएं लीजिये बद-दुआएँ नहीं ’

नजीब जंग जी नमस्कार,

कभी आप अच्छे इंसान रहे होंगे, काफी उपलब्धियां सुनी है आपकी- सिविल सर्विसेस, जामिया के चांसलर, एशियन डेवलपमेंट बैंक इत्यादि और अब आप दिल्ली के दिल पर है! राज्यपाल है आप दिल्ली के अच्छा लगता है सुनकर ! आपको रेख्ता में एक बार सुना था कभी  अच्छा और राजनैतिक बोलते हो आप !
अच्छा है सर !
अभी हाल ही में हाई कोर्ट ने दिल्ली पर आपका ही राज चलेगा ऐसा निर्णय दिया है ! क्या आप दिल से यही चाहते थे? आप जैसे साहित्यिक व्यक्ति का मैं बहुत सम्मान करता हूँ, मगर कभी कभी आपके बार में सोचता हूँ आप तो राजनैतिक हो ! आप इतने दिनों से दिल्ली के राज्यपाल हो, क्या आपको कभी नहीं लगा की हमारी दिल्ली का, आपकी दिल्ली का या मेरी दिल्ली का विकास हो !
मैंने राजनीती के अंदर कभी भी पैर नहीं रखे मगर इतना जनता हूँ राजनीती चुनाव जीतने या हारने तक होनी चाहिए फिर सरकार जनता की होती है और उस जनता के लिए सरकार को विकास करना चाहिए न की राजनीती ! और आप तो राजनैतिक आदमी हो भी नहीं फिर आप दिल्ली के लिए इतनी राजनीती क्यों कर रहे हो, क्या आप विकास में सरकार का साथ नहीं दे सकते ?
मैं उत्तर प्रदेश से हूँ, हमारे यहाँ आई. ए. एस. की बहुत इज्जत होती है क्योकि वहाँ के अनुसार, वो सबसे ज्यादा मेहनत करके बनता है – मगर आप जैसे काम आज कर रहे हो उससे आपके लिए सम्मान ख़त्म हो चुका है !
“राज्य की कार्यपालिका का प्रमुख राज्यपाल (गवर्नर) होता है, जो मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है। कुछ मामलों में राज्यपाल को विवेकाधिकार दिया गया है, ऐसे मामले में वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना भी कार्य करता है।”
यह परिभाषा है ‘राज्यपाल’ की हमारे संविधान में – जंग साहब, आप बताइये यही परिभाषा है न?
क्या आप कभी भी दिल्ली सरकार या दिल्ली के मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करते हो? या आदेश आपको प्रदेश के बाहर से मिलते है !
क्या आपको दिल्ली की जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार से सलाह लेने शर्म आती है? या आपने अपने आप को दिल्ली की जनता के लिए निर्णय लेने का विवेकाधिकार दे रखा है?
सर जो भी है आप चाहो तो दिल्ली कहाँ  से कहाँ  पहुच सकता है, विवेक से काम लीजिये दिल्ली को अपना दिल दीजिये – दिल्ली सरकार का साथ दीजिये !
दिल्ली की जनता को शिकायत का मौका मत दीजिये, जंग साहब – दुआएं लीजिये बद-दुआएँ नहीं !!
एक दिल्ली वाला –
अंकुर मिश्रा
Aug 6, 2016 - Ankur Mishra    No Comments

Pokémon GO – A Real Revolutions For You

“I’ll be right back,” he said running out the door, “there’s a really good one just down the road.”  For the few of us that haven’t downloaded Pokémon GO yet, this is becoming an all too familiar scenario and it’s only been out for a week. 

Pavements, restaurants and even revered memorials are overcrowding with people glued to their phones, trying to catch a rare Pokémon or travel far enough to hatch an egg. Since Pokémon GO launched last week, millions of people have been sucked into the race to catch ’em all.

Players, or trainers as they appear in the game, have become completely absorbed in their virtual world, bumping into people and lampposts as they count up the metres needed to reach the next level.

Pokémon goes bang

The app, in which users have to move around their local area to find different Pokémon, has exploded in popularity. It’s only been out for a week but around 70 million people already have the app on their phone as it skyrocketed to the top of iTunes and Android App download charts.

On social media, discussions about Pokémon GO are everywhere, with over 100 tweets a minute using #Pokémon GO and nearly 100,000 people on Facebook mentioning it in the past 24 hours. People are sharing tips on where to find coveted rare Pokémon, grouping their friends together for advice and sharing memes poking fun at the Pokémon GO craze.

A gaming revolution

While the release of a hotly anticipated game often leads to users shutting themselves in a dark room until they reach the coveted end, this app makes people go outside, travel around their local area and talk to people trying to catch the same figures.

It takes a lot to go viral on a global, the-majority-of-your-office-has-downloaded-it, kind of scale. Pokémon have done it through a mix of nostalgic appeal, an interactive interface and a sense of community.

Pokémon GO for marketing

While it may not seem like a natural fit, there’s a huge new audience milling around and you can increase the chance of them visiting your business in a few ways.

It is possible to buy ‘Pokécoins’ to create a hotspot where Pokémon collect, which could naturally draw players towards your business. If you run a shop, restaurant or café this could work really well because once people have trekked to your front they might stop and buy a snack.

If your business doesn’t lend itself as well, you could offer charging stations to save any players missing out on Pokémon because their battery has died. Similarly, if you find a rare Pokémon near your business you could advertise this on your social channels.

In a world that is uncertain about its future, Pokémon GO transports us back to the past where the only thing that matters is catching ’em all.

You also find your ways to make it useful. :)

Jul 12, 2016 - Ankur Mishra, INDIA    2 Comments

रवीश कुमार को एक खुला पत्र – ‘वापस आ जाओ सर अब’

सर,

आपने ही सिखाया है :

ऐसे अकेला मत छोड़िए सर !

बहुत दिन हो गए, अब नाराजगी छोड़कर वापस आ जाइये ! बहुत से लोग आपके बिना उदास है, सब लोग आपसे नहीं मिल सकते, आपको फोन नहीं कर सकते, आपके पास नहीं जा सकते, आपसे बाते नहीं कर सकते और आप भी सभी लोगो से नहीं मिल सकते न ही बाते कर सकते हो मगर आप ऐसे लोगो के लिए जरूरी हो ! आपकी बाते प्रेरणा  और आदर्श होती है ऐसे लोगो के लिए ! सर आप कुछ चंद लोगो की गलती की सजा हम सब को क्यों दे रहे हो ! सोशल मीडिया ही एक माध्यम है जहां पर कभी कभी आपसे बात हो जाती थी आप जब कभी रिप्लाई करते तो लगता था आप सामने से बोल रहे हो !
मैं खुद दिनभर में कई बार आपका ट्विटर और फेसबुक का प्रोफ़ाइल खोलता और लास्ट पोस्ट देखकर बंद कर देता हूँ ! सर मांझी के बाद भी नवाज साहब फिल्में आ गयी है आशा है आपने ‘रमन-राघव’ जरूर देखि होगी ! मैं तो सलाम करता हूँ नवाज साहब की एक्टिंग को, आपको कैसी लगी बताइएगा जरूर ! और कौन कौन सी फिल्म ये भी जरूर बताइयेगा !

जब आप सोशल मीडिआ में थे तो सभी दलों की अच्छाई और बुराई खुलकर पढ़ने को मिलती थी, अब तो कोई किसी की गा रहा है कोई किसी की !  अजीब लगता है, ये सब देखकर, सर जरूरत है आपकी वर्ना लोगो को वही पढ़ने की आदत पड़ जाएगी जो आज पत्रकार और राजनैतिक दल पढ़वाना चाहते है !  प्लीज सर वापस आ जाओ, उसी पुराने अंदाज में, रोज शाम को जैसे बाते करते थे फिर से बाते करेंगे ट्विटर पे !  कई बार वैशाली से गुजरा तो सोचा आपके घर के की कुण्डी खट-खटाऊ मगर फिर सोचा आप जानते ही नहीं होगे मुझे, या आपके घर से कोई गार्ड ही वापस न भेज दे ! हिम्मत नहीं हुयी कभी, फिर सोचा आप लिखते हो- लिखकर ही भेजता हूँ आपको शायद पढ़ने का वक्त मिले, इसी पत्र को मैंने आपके घर पर भी भेजा है कभी वक्त मिले तो पढ़ियेगा जरूर !
एक बात और सर गालियाँ अब भी बरस रही है यहाँ पर, सरकार ने या किसी ने कुछ नहीं किया अभी तक ! मुझे और मेरे परिवार को भी रोजाना कुछ शब्द मिल जाते है ! पर धैर्य रखा हुआ है शायद कभी “भक्तवणी” परिवर्तित हो, सच को सच और झूठ को झूठ बोलने और समझने की हिम्मत आये उनमे ! शायद उनके भी माँ बाप हो और वो उनका सम्मान करना सीखे !
हाँ इसी “शायद” की वजह से आपका इन्तजार मैं रोज करता हूँ – शायद हम और आप मिलकर और लिखकर ही कुछ बदल दे !
शायद ये पत्र आपको वापस ला सके या शायद नहीं ! मगर सोशल मीडिया और आपके कुछ ‘फैन्स” आपको बहुत मिस करते है !
उन लोगो के लिए ही आ जाइए जिनके लिए आप थोड़ा सा भी प्यार रखते हो ! :) इंतजार है !!

अनजान,
अंकुर मिश्रा

Why work for a start-up?

You will read many myths about Startups Life but listen Working at a startup isn’t for everyone. You’ll work long long hours, with long list of plans and strategy changing daily. Everything will move very quickly and often it will feel like you’re struggling even to keep you head above the water. But in this lies the benefit.

You’ll learn a lot about a lot very quickly. Job titles are far less meaningful than they will be in many other companies, as staff are tasked with whatever needs doing rather than what they were hired for. One day you’ll be sifting through a massive database of data for opportunities, the next you’ll be doing a doing a photoshoot in the rain. Doing SUMs in excel, crafting something in board. anything and many-thing…

 

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On top of learning a wide variety of different skills very quickly you’re also likely to be able to make a much bigger impact. Workers tend to have a larger impact at smaller companies, and this is especially true when the company is breaking completely new ground, rather than starting a business with a tried and tested formula. You’ll be asked to come up with, hone and execute a strategy rather than just execute one.

But you have to Trust and respect your team. You should always be a part of every small and big event of company. This is your baby. Treat like a baby. So always be prepare to work hard and give your best to your startup vision and make it Billion dollar company. This will be incredibly rewarding.

So tight your shoes and shoot your life.

May 15, 2016 - Ankur Mishra, INDIA, Politics    1 Comment

KV Nasha: Fantastic and Serious Melody By Kumar Vishwas

Swachh Punjab. No more Drug Abuse.  Nice initiative by Dr. Kumar Vishwas. Personally I am a big fan of KV. I always follow his poetry and politics. The new video released by him is the next level of inspiration for youth of Panjab and India. (ओये छड्ड दे पुडियाँ जट्टा तेरी गुड़िया करे पुकार…)

Watch his full Song:

This song has touched the vein of Punjabis. The emotional lyrics, combined with hard-hitting visuals makes one convince that Punjab needs a revolution to end the apathy shown towards them by those in power. With the upcoming elections in sight, Kumar Vishwas attempts to project broom as the mass symbol to restore the pride of Punjab.

 

“People who do drugs are not culprits but patients. We have to help them. Culprits are people who are running the drug network,” and alleged that “we all know that in Pathankot attack, how the drug business was one of the factors.” – Dr. Kumar Vishwas

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Here is full Song, Must Read :

Saddi watt kha gaye,
Fasal kha gaye,
Khet kha gaye,
Baadal,

(Khet kha gaye,
Baadal) (x2)

Saddi sadak kha gaye,
Nahar kha gaye,
Ret kha gaye baadal,

(Ret kha gaye baadal) (x2)

Jad nahse de kaarobaar hoye,
Gabru jawaan murdaar hoye,
Horan nu karzaa den wale,
Aappe hi karzedaar hoye,

Chitte di tijarat karti ae,
Chitte di tijarat karti ae,
Khasma khaani sarkaar,

Oye chhad de pudiyan jatta,
Teri gudiya kare pukaar, (x2)

(Teri gudiya kare pukaar) (x4)

Besharm siyasat da dalaal,
Lokaan da sab kuchh haran laga,
Sukhbir bana dukhbir jadon,
Parkash andhera karan laga,

Guruaan di dharti sisak uthi,
Akhaan da paani maran laga,
Hanjuan da sagar gali-gali,
Har ghar chaubare bharan laga,

Waris Shah di dhee rondi ae,
Waris Shah di dhee rondi ae,
Hatth chhuti patwaar,

Oye chhad de pudiyan jatta,
Teri gudiya kare pukaar, (x2)

(Teri gudiya kare pukaar) (x4)

Neta di tijori bharan layi,
Janta da khazana reet gaya,
Gurudwaryan di golak te jadd,
Choraan da mann parteet gaya,

Har laaj gayi ghardwaar gaya,
Asmat.. kismat.. takdeer gayi,
Bhangra Gidha dholak wala,
Jadd geet gaya sangeet gaya,

Hun fad le jhadu jatta,
Chal fad le jhadu jatta,
Ghar aangan layi buhar,

Oye chhad de pudiyan jatta,
Teri gudiya kare pukaar, (x2)

(Teri gudiya kare pukaar) (x4)

Apr 28, 2016 - Ankur Mishra, INDIA    No Comments

Ask yourself, what is your real contribution towards the society?

Many people want to impact the world. But for most, it remains a futuristic, romantic goal, which they plan to achieve through volunteer work, writing, policy, art, and so on, “some” day. There often is no hint of an intent to do the same in the present. Malice, ego, prejudice and arrogance together limit people from understanding and impacting their immediate sphere of influence.

The ability to impact people around you is a value system, not an end goal. As long as there are people around, impact can be created.

If you want to create impact on the world some day, it would be worthwhile to ask yourself, how much could you have contributed to the lives around you in the past few weeks, and how much you actually did. If the gap is large, then the goal is somewhere misplaced.

Mar 28, 2016 - Ankur Mishra, Politics    No Comments

Will caste system disappear from India in the next few years?

When Manohar Parrikar and Suresh Prabhu were appointed cabinet ministers in November 2014, senior journalist Rajdeep Sardesai tweetd:


Humans have always liked to classify themselves into communities which inevitably give them an identity. Sardesai’s tweet shows that caste is present, irrespective of your status in society, as a tool to identify oneself. Caste in this form can instill pride similar to the pride of being a “Hindu”, “Indian” or “Maharashtrian”.

The problem, though, is that caste, primarily, was not a tool for identity, but one for hierarchy and hence discrimination. An egalitarian system would make it as plausible to hear of a “proud Bhangi” and a “proud Chamar”, as it is to hear of a “proud Brahmin” and a “proud Hindu”.

Unfortunately, this traditional perspective on caste-based hierarchy is legitimized by the state too. On the launch of Swachha Bharat Abhiyaan, government officials across hierarchy picked up brooms to sweep the floor. However, for every other day when tokenism is not the trend, the burdens of sanitation and sweeping roads – jobs paid for by the state – fall on largely a specific set of people, identified by their caste.

According to the Socio-Economic Caste Census, 2011, 180,657 families are engaged in manual scavenging, a caste-based occupation. Sanitation in the state-run Indian railways depends on manual scavenging, which is forbidden by law.

This goes on to show at different levels – individual, societal and governmental – that caste, both as identity and hierarchy, is deep-rooted in the Indian society.

An Indian Express survey showed that 27 per cent Indians still practise untouchability, which is outlawed. But untouchability is only one extreme aspect of caste. Historically, caste manifests itself in forms such as social ridicule, emotional subjugation, physical, mental and sexual abuse, and lack of opportunities and resources. Over the 66 years of the Indian republic, caste has shown that it can exist in new forms.

Evaluating the future of caste requires us to ignore the extremes which proper law enforcement can take care of. It is everyday mannerisms that are more difficult to uproot. Names of Dalit castes are often used as derogatory slang. Newspaper matrimonials, which classify matches on the basis of caste, reflect that caste dictates who we marry. Family names are still associated with caste: a Sharma can never be a Dalit. It is tough to imagine that caste-denoting family names will go away in few generations’ time.

Elections in the country continue to show that the ones in power need caste to stay, to remain in power, even if the powerless were to reject it. The popular punch, “In India you don’t cast your vote, you vote your caste” and its regular evidence shows that caste can change forms, but may never disappear. The continuing relevance of caste-based affirmative action reflects the lack of political will to uproot the obvious co-relation between caste and socio-economic status as soon as possible.

Caste has adjusted itself to continue to exist in some form, even in a new, developing, post-1991 India, instead of globalization aiding its removal. This is a characteristic of a perpetual system which can stand the test of time and trends. In its current form – tool for identity, hierarchy and political strategy – it is evident that caste is alive and healthy.

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Mar 11, 2016 - Ankur Mishra, INDIA, Politics    No Comments

Free speech: limits needed, but just enough to keep system functioning

Being able to think limitlessly is more fundamental to a human being, than letting the given day’s socio-cultural constructs determine what to think. While the freedom to express protects one’s most basic human rights, some reasonable restrictions are required to protect the existing systems of which one is part of.

Ideas that define a nation, religion, community, God and governance have changed over time, and will continue to do so. Each new idea emerges as an improvement over traditionally-held ideas, with changing context of life and society. The fact that a new idea challenges the status quo means it will face resistance, but blocking that flow of ideas blocks evolution. Therefore, it is important that space be given for thinkers to express new ideas and discuss and debate their feasibility.

However, here a distinction is required in what challenges the status quo and what insults it. Society, culture, religion and politics provide a much-needed system and order for how we live. Though that system must change with time, the need of one cannot be neglected. So, we need just enough protective forces that keep a system in place: enough to allow space for new ideas, but not so much as to kill the order of the day.

Speech which can be perceived as “anti-national” may invite abhorrence, but as long as it is harmless, its expression must not be limited. In this respect, while freedom to express is still paramount, the implications of that expression cannot be ignored. Article 19(2) of the Constitution puts restrictions on free speech if it is against the sovereignty and integrity of India, national security, international relations, public order, decency or morality, or incites offence.

In today’s world, how a nation approaches ideas can have far-reaching consequences in terms of defence, economy, law and order, security and international cooperation. A new ideology challenging God may result in communal disorder if force is used to enforce that ideology. An idea which seeks a violent end to the current idea of a nation-state may result in a threat to national security. A policy which seeks an immediate end to capitalism may hurt the national economy, and policies which look for a sudden replacement of socialism with capitalism will hurt the most vulnerable citizens.

 

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Ideas must constructively debate and consider; they must not threaten. Ideas must add to the discourse; they should not kill the current discourse. The way ideas are expressed must recognize that at best, they are in transition from one to another.

Expression of new ideas needs to accommodate what is traditionally held, recognizing the context in which the earlier ideas were formed, and appreciating their merits. This will ensure that a reasoned debate takes place and individuals on both sides of what is expressed can weigh what is and what can be.

Mar 6, 2016 - Ankur Mishra    No Comments

Nationalists don’t question the system – until there’s a power cut and they can’t charge their iPhones

If you are rich and questioning the system, you are a hypocrite.
If you are middle-class and questioning the system, you are a loser.
If you are poor and questioning the system, you are a parasite.
If you are a man and questioning the system, you have been emasculated.
If you are a woman and questioning the system, you are a lesbian prostitute feminazi.
If you are Hindu and questioning the system, you are a pseudo-secular.
If you are Muslim and questioning the system, you are an ISI agent.
If you are upper-caste and questioning the system, you are misguided.
If you are lower-caste and questioning the system, you are a spoilt brat.
If you are Indian and questioning the system, you don’t care for the soldiers guarding our borders.
If you are non-Indian and questioning the system, you want to sabotage our economy.

Nationalists don’t question the system – until there’s a power cut and they can’t charge their iPhones.

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